श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.7.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

प्रादाय मात्रे प्रतिहृत्य१ विस्मिताः

कृष्णं च तस्योरसि लम्बमानम्।

तं स्वस्तिमन्तं पुरुषादनीतं

विहायसा मृत्युमुखात् प्रमुक्तम्।

गोप्यश्‍च गोपाः किल नन्दमुख्या

लब्ध्वा पुनः२ प्रापुरतीव मोदम्॥ ३०

prādāya mātre pratihṛtya vismitāḥ

kṛṣṇaṃ ca tasyorasi lambamānam|

taṃ svastimantaṃ puruṣādanītaṃ

vihāyasā mṛtyumukhāt pramuktam|

gopyaśca gopāḥ kila nandamukhyā

labdhvā punaḥ prāpuratīva modam|| 30

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्ण उसके वक्षःस्थलपर लटक रहे थे । यह देखकर गोपियाँ विस्मित हो गयीं। उन्होंने झटपट वहाँ जाकर श्रीकृष्णको गोदमें ले लिया और लाकर उन्हें माताको दे दिया। बालक मृत्युके मुखसे सकुशल लौट आया। यद्यपि उसे राक्षस आकाशमें उठा ले गया था, फिर भी वह बच गया। इस प्रकार बालक श्रीकृष्णको फिर पाकर यशोदा आदि गोपियों तथा नन्द आदि गोपोंको अत्यन्त आनन्द हुआ॥ ३०॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    गृह्य।

    (मुद्रित पृष्ठ 166)
  2. २

    सुतं।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 166)

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