श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.7.31

दशम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

अहो बतात्यद्भुतमेष रक्षसा

बालो निवृत्तिं गमितोऽभ्यगात् पुनः।

हिंस्रः स्वपापेन विहिंसितः खलः

साधुः समत्वेन भयाद् विमुच्यते॥ ३१

aho batātyadbhutameṣa rakṣasā

bālo nivṛttiṃ gamito'bhyagāt punaḥ|

hiṃsraḥ svapāpena vihiṃsitaḥ khalaḥ

sādhuḥ samatvena bhayād vimucyate|| 31

अर्थ

वे कहने लगे—‘अहो! यह तो बड़े आश्‍चर्यकी बात है। देखो तो सही, यह कितनी अद्भुत घटना घट गयी! यह बालक राक्षसके द्वारा मृत्युके मुखमें डाल दिया गया था, परन्तु फिर जीता-जागता आ गया और उस हिंसक दुष्टको उसके पाप ही खा गये! सच है, साधुपुरुष अपनी समतासे ही सम्पूर्ण भयोंसे बच जाता है॥ ३१॥

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