श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.71.6

दशम स्कन्ध · अध्याय 71 · अथैकसप्ततितमोऽध्यायः

द्वैरथे स तु जेतव्यो मा शताक्षौहिणीयुतः।

ब्रह्मण्योऽभ्यर्थितो विप्रैर्न प्रत्याख्याति कर्हिचित्॥ ६

dvairathe sa tu jetavyo mā śatākṣauhiṇīyutaḥ|

brahmaṇyo'bhyarthito viprairna pratyākhyāti karhicit|| 6

अर्थ

उसे आमने-सामनेके युद्धमें एक वीर जीत ले, यही सबसे अच्छा है। सौ अक्षौहिणी सेना लेकर जब वह युद्धके लिये खड़ा होगा, उस समय उसे जीतना आसान न होगा। जरासन्ध बहुत बड़ा ब्राह्मणभक्त है। यदि ब्राह्मण उससे किसी बातकी याचना करते हैं, तो वह कभी कोरा जवाब नहीं देता॥ ६॥

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