‘क्यों रे नटखट! तू बहुत ढीठ हो गया है। तूने अकेलेमें छिपकर मिट्टी क्यों खायी? देख तो तेरे दलके तेरे सखा क्या कह रहे हैं! तेरे बड़े भैया बलदाऊ भी तो उन्हींकी ओरसे गवाही दे रहे हैं’॥ ३४॥✎ 140414051406140722382239
कस्मान्मृदमदान्तात्मन् भवान् भक्षितवान् रहः।
वदन्ति तावका ह्येते कुमारास्तेऽग्रजोऽप्ययम्॥ ३४
‘क्यों रे नटखट! तू बहुत ढीठ हो गया है। तूने अकेलेमें छिपकर मिट्टी क्यों खायी? देख तो तेरे दलके तेरे सखा क्या कह रहे हैं! तेरे बड़े भैया बलदाऊ भी तो उन्हींकी ओरसे गवाही दे रहे हैं’॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.8.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 178) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/8/34/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)
#1404 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): थींण्। → थीं।
#1405 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): लियाञ्। → लिया।
#1406 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): कहा—‘माँ! → कहा—‘मा!
#2238 टिप्पणी: → यशोदाजी जानती थीं कि इस हाथने मिट्टी खानेमें सहायता की है। चोरका सहायक भी चोर ही है। इसलिये उन्होंने हाथ ही पकड़ा।
#2239 टिप्पणी: → भगवान्के नेत्रमें सूर्य और चन्द्रमाका निवास है। वे कर्मके साक्षी हैं। उन्होंने सोचा कि पता नहीं श्रीकृष्ण मिट्टी खाना स्वीकार करेंगे कि मुकर जायँगे। अब हमारा कर्तव्य क्या है। इसी भावको सूचित करते हुए दोनों नेत्र चकराने लगे।