श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.85.31

दशम स्कन्ध · अध्याय 85 · अथ पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

यस्यांशांशांशभागेन विश्‍वोत्पत्तिलयोदयाः।

भवन्ति किल विश्‍वात्मंस्तं त्वाद्याहं गतिं गता॥ ३१

yasyāṃśāṃśāṃśabhāgena viśvotpattilayodayāḥ|

bhavanti kila viśvātmaṃstaṃ tvādyāhaṃ gatiṃ gatā|| 31

अर्थ

विश्‍वात्मन्! तुम्हारे पुरुषरूप अंशसे उत्पन्‍न हुई मायासे गुणोंकी उत्पत्ति होती है और उनके लेशमात्रसे जगत‍्की उत्पत्ति, विकास तथा प्रलय होता है। आज मैं सर्वान्तःकरणसे तुम्हारी शरण हो रही हूँ॥ ३१॥ मैंने सुना है कि तुम्हारे गुरु सान्दीपनिजीके पुत्रको मरे बहुत दिन हो गये थे। उनको गुरुदक्षिणा देनेके लिये उनकी आज्ञा तथा कालकी प्रेरणासे तुम दोनोंने उनके पुत्रको यमपुरीसे वापस ला दिया॥ ३२॥ तुम दोनों योगीश्‍वरोंके भी ईश्‍वर हो। इसलिये आज मेरी भी अभिलाषा पूर्ण करो। मैं चाहती हूँ कि तुम दोनों मेरे उन पुत्रोंको, जिन्हें कंसने मार डाला था, ला दो और उन्हें मैं भर आँख देख लूँ॥ ३३॥

यह व्याख्या श्लोक 10.85.31 से 10.85.33 तककी एक साथ है।

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