॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.9.16
यदाऽऽसीत्तदपि न्यूनं तेनान्यदपि सन्दधे।
तदपि द्व्यङ्गुलं न्यूनं यद् यदादत्त बन्धनम्॥ १६✎ 2063
yadā''sīttadapi nyūnaṃ tenānyadapi sandadhe|
tadapi dvyaṅgulaṃ nyūnaṃ yad yadādatta bandhanam|| 16
अर्थ
टिप्पणियाँ
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१. संस्कृत-साहित्यमें ‘गुण’ शब्दके अनेक अर्थ हैं—सद्गुण, सत्त्व आदि गुण और रस्सी। सत्त्व, रज आदि गुण भी अखिल ब्रह्माण्डनायक त्रिलोकीनाथ भगवान्का स्पर्श नहीं कर सकते। फिर यह छोटा-सा गुण ( दो बित्तेकी रस्सी) उन्हें कैसे बाँध सकता है। यही कारण है कि यशोदा माताकी रस्सी पूरी नहीं पड़ती थी।
२. संसारके विषय इन्द्रियोंको ही बाँधनेमें समर्थ हैं—विषिण्वन्ति इति विषयाः। ये हृदयमें स्थित अन्तर्यामी और साक्षीको नहीं बाँध सकते। तब गो-बन्धक (इन्द्रियों या गायोंको बाँधनेवाली) रस्सी गो-पति (इन्द्रियों या गायोंके स्वामी) को कैसे बाँध सकती है?
३. वेदान्तके सिद्धान्तानुसार अध्यस्तमें ही बन्धन होता है, अधिष्ठानमें नहीं। भगवान् श्रीकृष्णका उदर अनन्तकोटि ब्रह्माण्डोंका अधिष्ठान है। उसमें भला बन्धन कैसे हो सकता है?
४. भगवान् जिसको अपनी कृपाप्रसादपूर्ण दृष्टिसे देख लेते हैं, वही सर्वदाके लिये बन्धनसे मुक्त हो जाता है। यशोदा माता अपने हाथमें जो रस्सी उठातीं, उसीपर श्रीकृष्णकी दृष्टि पड़ जाती। वह स्वयं मुक्त हो जाती, फिर उसमें गाँठ कैसे लगती?
५. कोई साधक यदि अपने गुणोंके द्वारा भगवान्को रिझाना चाहे तो नहीं रिझा सकता। मानो यही सूचित करनेके लिये कोई भी गुण (रस्सी) भगवान्के उदरको पूर्ण करनेमें समर्थ नहीं हुआ।
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रस्सी दो अंगुल ही कम क्यों हुई? इसपर कहते हैं—
१. भगवान्ने सोचा कि जब मैं शुद्धहृदय भक्तजनोंको दर्शन देता हूँ, तब मेरे साथ एकमात्र सत्त्वगुणसे ही सम्बन्धकी स्फूर्ति होती है, रज और तमसे नहीं। इसलिये उन्होंने रस्सीको दो अंगुल कम करके अपना भाव प्रकट किया।
२. उन्होंने विचार किया कि जहाँ नाम और रूप होते हैं, वहीं बन्धन भी होता है। मुझ परमात्मामें बन्धनकी कल्पना कैसे? जब कि ये दोनों ही नहीं। दो अंगुलकी कमीका यही रहस्य है।
३. दो वृक्षोंका उद्धार करना है। यही क्रिया सूचित करनेके लिये रस्सी दो अंगुल कम पड़ गयी।
४. भगवत्कृपासे द्वैतानुरागी भी मुक्त हो जाता है और असंग भी प्रेमसे बँध जाता है। यही दोनों भाव सूचित करनेके लिये रस्सी दो अंगुल कम हो गयी।
५. यशोदा माताने छोटी-बड़ी अनेकों रस्सियाँ अलग-अलग और एक साथ भी भगवान्की कमरमें लगायीं, परन्तु वे पूरी न पड़ीं; क्योंकि भगवान्में छोटे-बड़ेका कोई भेद नहीं है। रस्सियोंने कहा—भगवान्के समान अनन्तता, अनादिता और विभुता हमलोगोंमें नहीं है। इसलिये इनको बाँधनेकी बात बंद करो। अथवा जैसे नदियाँ समुद्रमें समा जाती हैं वैसे ही सारे गुण (सारी रस्सियाँ) अनन्तगुण भगवान्में लीन हो गये, अपना नाम-रूप खो बैठे। ये ही दो भाव सूचित करनेके लिये रस्सियोंमें दो अंगुलकी न्यूनता हुई।