यशोदारानीने घरकी सारी रस्सियाँ जोड़ डालीं, फिर भी वे भगवान् श्रीकृष्णको न बाँध सकीं। उनकी असफलतापर देखनेवाली गोपियाँ मुसकराने लगीं और वे स्वयं भी मुसकराती हुई आश्चर्यचकित हो गयीं†॥ १७॥✎ 14111412
एवं स्वगेहदामानि यशोदा सन्दधत्यपि।
गोपीनां सुस्मयन्तीनां स्मयन्ती विस्मिताभवत्॥ १७
यशोदारानीने घरकी सारी रस्सियाँ जोड़ डालीं, फिर भी वे भगवान् श्रीकृष्णको न बाँध सकीं। उनकी असफलतापर देखनेवाली गोपियाँ मुसकराने लगीं और वे स्वयं भी मुसकराती हुई आश्चर्यचकित हो गयीं॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.9.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 187) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/9/17/
टिप्पणियाँ
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वे मन-ही-मन सोचतीं—इसकी कमर मुट्ठीभरकी है, फिर भी सैकड़ों हाथ लम्बी रस्सीसे यह नहीं बँधता है। कमर तिलमात्र भी मोटी नहीं होती, रस्सी एक अंगुल भी छोटी नहीं होती, फिर भी वह बँधता नहीं। कैसा आश्चर्य है। हर बार दो अंगुलकी ही कमी होती है, न तीनकी, न चारकी, न एककी। यह कैसा अलौकिक चमत्कार है।