श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.1.20

एकादश स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

श्रुत्वामोघं विप्रशापं दृष्ट्वा च मुसलं नृप।

विस्मिता भयसन्त्रस्ता बभूवुर्द्वारकौकसः॥ २०

śrutvāmoghaṃ vipraśāpaṃ dṛṣṭvā ca musalaṃ nṛpa|

vismitā bhayasantrastā babhūvurdvārakaukasaḥ|| 20

अर्थ

राजन्! जब सब लोगोंने ब्राह्मणोंके शापकी बात सुनी और अपनी आँखोंसे उस मूसलको देखा, तब सब-के-सब द्वारकावासी विस्मित और भयभीत हो गये; क्योंकि वे जानते थे कि ब्राह्मणोंका शाप कभी झूठा नहीं होता॥ २०॥

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