श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.10.28

एकादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

पशूनविधिनाऽऽलभ्य प्रेतभूतगणान् यजन्।

नरकानवशो जन्तुर्गत्वा यात्युल्बणं तमः॥ २८

paśūnavidhinā''labhya pretabhūtagaṇān yajan|

narakānavaśo janturgatvā yātyulbaṇaṃ tamaḥ|| 28

अर्थ

यदि कोई मनुष्य दुष्टोंकी संगतिमें पड़कर अधर्म-परायण हो जाय, अपनी इन्द्रियोंके वशमें होकर मनमानी करने लगे, लोभवश दाने-दानेमें कृपणता करने लगे, लम्पट हो जाय अथवा प्राणियोंको सताने लगे और विधि-विरुद्ध पशुओंकी बलि देकर भूत और प्रेतोंकी उपासनामें लग जाय, तब तो वह पशुओंसे भी गया-बीता हो जाता है और अवश्य ही नरकमें जाता है। उसे अन्तमें घोर अन्धकार, स्वार्थ और परमार्थसे रहित अज्ञानमें ही भटकना पड़ता है॥ २७-२८॥

यह अर्थ श्लोक 27–28 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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