॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.10.29
कर्माणि दुःखोदर्काणि कुर्वन् देहेन तैः पुनः।
देहमाभजते तत्र किं सुखं मर्त्यधर्मिणः॥ २९
karmāṇi duḥkhodarkāṇi kurvan dehena taiḥ punaḥ|
dehamābhajate tatra kiṃ sukhaṃ martyadharmiṇaḥ|| 29
अर्थ
जितने भी सकाम और बहिर्मुख करनेवाले कर्म हैं, उनका फल दुःख ही है। जो जीव शरीरमें अहंता-ममता करके उन्हींमें लग जाता है, उसे बार-बार जन्म-पर-जन्म और मत्यु-पर-मृत्यु प्राप्त होती रहती है। ऐसी स्थितिमें मृत्युधर्मा जीवको क्या सुख हो सकता है?॥ २९॥