॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.10.3
सुप्तस्य विषयालोको ध्यायतो वा मनोरथः।
नानात्मकत्वाद् विफलस्तथा भेदात्मधीर्गुणैः॥ ३
suptasya viṣayāloko dhyāyato vā manorathaḥ|
nānātmakatvād viphalastathā bhedātmadhīrguṇaiḥ|| 3
अर्थ
इसके सम्बन्धमें ऐसा विचार करना चाहिये कि स्वप्न-अवस्थामें और मनोरथ करते समय जाग्रत्-अवस्थामें भी मनुष्य मन-ही-मन अनेकों प्रकारके विषयोंका अनुभव करता है, परन्तु उसकी वह सारी कल्पना वस्तुशून्य होनेके कारण व्यर्थ है। वैसे ही इन्द्रियोंके द्वारा होनेवाली भेदबुद्धि भी व्यर्थ ही है, क्योंकि यह भी इन्द्रियजन्य और नाना वस्तुविषयक होनेके कारण पूर्ववत् असत्य ही है॥ ३॥