श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.10.2

एकादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

अन्वीक्षेत विशुद्धात्मा देहिनां विषयात्मनाम्।

गुणेषु तत्त्वध्यानेन सर्वारम्भविपर्ययम्॥ २

anvīkṣeta viśuddhātmā dehināṃ viṣayātmanām|

guṇeṣu tattvadhyānena sarvārambhaviparyayam|| 2

अर्थ

निष्काम होनेका उपाय यह है कि स्वधर्मोंका पालन करनेसे शुद्ध हुए अपने चित्तमें यह विचार करे कि जगत‍्के विषयी प्राणी शब्द, स्पर्श, रूप आदि विषयोंको सत्य समझकर उनकी प्राप्तिके लिये जो प्रयत्‍न करते हैं, उसमें उनका उद्देश्य तो यह होता है कि सुख मिले, परन्तु मिलता है दुःख॥ २॥

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