श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.10.1

एकादश स्कन्ध · अध्याय 10 · अथ दशमोऽध्यायः

अथ दशमोऽध्यायः

लौकिक तथा पारलौकिक भोगोंकी असारताका निरूपण

श्रीभगवानुवाच

मयोदितेष्ववहितः स्वधर्मेषु मदाश्रयः।

वर्णाश्रमकुलाचारमकामात्मा समाचरेत्॥ १

mayoditeṣvavahitaḥ svadharmeṣu madāśrayaḥ|

varṇāśramakulācāramakāmātmā samācaret|| 1

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—प्यारे उद्धव! साधकको चाहिये कि सब तरहसे मेरी शरणमें रहकर (गीता-पाञ्चरात्र आदिमें) मेरे द्वारा उपदिष्ट अपने धर्मोंका सावधानीसे पालन करे। साथ ही जहाँतक उनसे विरोध न हो वहाँतक निष्कामभावसे अपने वर्ण, आश्रम और कुलके अनुसार सदाचारका भी अनुष्ठान करे॥ १॥

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