॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.11.14
यस्य स्युर्वीतसंकल्पाः प्राणेन्द्रियमनोधियाम्।
वृत्तयः स विनिर्मुक्तो देहस्थोऽपि हि तद्गुणैः॥ १४
yasya syurvītasaṃkalpāḥ prāṇendriyamanodhiyām|
vṛttayaḥ sa vinirmukto dehastho'pi hi tadguṇaiḥ|| 14
अर्थ
जिनके प्राण, इन्द्रिय, मन और बुद्धिकी समस्त चेष्टाएँ बिना संकल्पके होती हैं, वे देहमें स्थित रहकर भी उसके गुणोंसे मुक्त हैं॥ १४॥