श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.11.14

एकादश स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

यस्य स्युर्वीतसंकल्पाः प्राणेन्द्रियमनोधियाम्।

वृत्तयः स विनिर्मुक्तो देहस्थोऽपि हि तद्गुणैः॥ १४

yasya syurvītasaṃkalpāḥ prāṇendriyamanodhiyām|

vṛttayaḥ sa vinirmukto dehastho'pi hi tadguṇaiḥ|| 14

अर्थ

जिनके प्राण, इन्द्रिय, मन और बुद्धिकी समस्त चेष्टाएँ बिना संकल्पके होती हैं, वे देहमें स्थित रहकर भी उसके गुणोंसे मुक्त हैं॥ १४॥

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