arcyate vā kvacittatra na vyatikriyate budhaḥ|| 15
अर्थ
उन तत्त्वज्ञ मुक्त पुरुषोंके शरीरको चाहे हिंसक लोग पीड़ा पहुँचायें और चाहे कभी कोई दैवयोगसे पूजा करने लगे—वे न तो किसीके सतानेसे दुःखी होते हैं और न पूजा करनेसे सुखी॥ १५॥
यस्यात्मा हिंस्यते हिंस्रैर्येन किंचिद् यदृच्छया।
अर्च्यते वा क्वचित्तत्र न व्यतिक्रियते बुधः॥ १५
उन तत्त्वज्ञ मुक्त पुरुषोंके शरीरको चाहे हिंसक लोग पीड़ा पहुँचायें और चाहे कभी कोई दैवयोगसे पूजा करने लगे—वे न तो किसीके सतानेसे दुःखी होते हैं और न पूजा करनेसे सुखी॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.11.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 783) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/11/15/