श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.11.16

एकादश स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

न स्तुवीत न निन्देत कुर्वतः साध्वसाधु वा।

वदतो गुणदोषाभ्यां वर्जितः समदृङ्मुनिः॥ १६

na stuvīta na nindeta kurvataḥ sādhvasādhu vā|

vadato guṇadoṣābhyāṃ varjitaḥ samadṛṅmuniḥ|| 16

अर्थ

जो समदर्शी महात्मा गुण और दोषकी भेददृष्टिसे ऊपर उठ गये हैं, वे न तो अच्छे काम करनेवालेकी स्तुति करते हैं और न बुरे काम करनेवालेकी निन्दा; न वे किसीकी अच्छी बात सुनकर उसकी सराहना करते हैं और न बुरी बात सुनकर किसीको झिड़कते ही हैं॥ १६॥

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