श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.11.17

एकादश स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

न कुर्यान्‍न वदेत् किंचिन्‍न ध्यायेत् साध्वसाधु वा।

आत्मारामोऽनया वृत्त्या विचरेज्जडवन्मुनिः॥ १७

na kuryānna vadet kiṃcinna dhyāyet sādhvasādhu vā|

ātmārāmo'nayā vṛttyā vicarejjaḍavanmuniḥ|| 17

अर्थ

जीवन्मुक्त पुरुष न तो कुछ भला या बुरा काम करते हैं, न कुछ भला या बुरा कहते हैं और न सोचते ही हैं। वे व्यवहारमें अपनी समान वृत्ति रखकर आत्मानन्दमें ही म‌ग्‍न रहते हैं और जडके समान मानो कोई मूर्ख हो इस प्रकार विचरण करते रहते हैं॥ १७॥

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