श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.11.28

एकादश स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

त्वं ब्रह्म परमं व्योम पुरुषः प्रकृतेः परः।

अवतीर्णोऽसि भगवन् स्वेच्छोपात्तपृथग्वपुः॥ २८

tvaṃ brahma paramaṃ vyoma puruṣaḥ prakṛteḥ paraḥ|

avatīrṇo'si bhagavan svecchopāttapṛthagvapuḥ|| 28

अर्थ

भगवन्! मैं जानता हूँ कि आप प्रकृतिसे परे पुरुषोत्तम एवं चिदाकाशस्वरूप ब्रह्म हैं। आपसे भिन्‍न कुछ भी नहीं है; फिर भी आपने लीलाके लिये स्वेच्छासे ही यह अलग शरीर धारण करके अवतार लिया है। इसलिये वास्तवमें आप ही भक्ति और भक्तका रहस्य बतला सकते हैं॥ २८॥

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