श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.11.30

एकादश स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

कामैरहतधीर्दान्तो मृदुः शुचिरकिंचनः।

अनीहो मितभुक् शान्तः स्थिरो मच्छरणो मुनिः॥ ३०

kāmairahatadhīrdānto mṛduḥ śucirakiṃcanaḥ|

anīho mitabhuk śāntaḥ sthiro maccharaṇo muniḥ|| 30

अर्थ

उसकी बुद्धि कामनाओंसे कलुषित नहीं होती। वह संयमी, मधुरस्वभाव और पवित्र होता है। संग्रह-परिग्रहसे सर्वथा दूर रहता है। किसी भी वस्तुके लिये वह कोई चेष्टा नहीं करता। परिमित भोजन करता है और शान्त रहता है। उसकी बुद्धि स्थिर होती है। उसे केवल मेरा ही भरोसा होता है और वह आत्मतत्त्वके चिन्तनमें सदा संल‌ग्‍न रहता है॥ ३०॥

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