श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.12.1

एकादश स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

अथ द्वादशोऽध्यायः

सत्संगकी महिमा और कर्म तथा कर्मत्यागकी विधि

श्रीभगवानुवाच

न रोधयति मां योगो न सांख्यं धर्म एव च।

न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो नेष्टापूर्तं न दक्षिणा॥ १

na rodhayati māṃ yogo na sāṃkhyaṃ dharma eva ca|

na svādhyāyastapastyāgo neṣṭāpūrtaṃ na dakṣiṇā|| 1

अर्थ

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—प्रिय उद्धव! जगत‍्में जितनी आसक्तियाँ हैं, उन्हें सत्संग नष्ट कर देता है। यही कारण है कि सत्संग जिस प्रकार मुझे वशमें कर लेता है वैसा साधन न योग है न सांख्य, न धर्मपालन और न स्वाध्याय। तपस्या, त्याग, इष्टापूर्त्त और दक्षिणासे भी मैं वैसा प्रसन्‍न नहीं होता। कहाँतक कहूँ—व्रत, यज्ञ, वेद, तीर्थ और यम-नियम भी सत्संगके समान मुझे वशमें करनेमें समर्थ नहीं हैं॥ १-२॥

यह अर्थ श्लोक 1–2 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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