॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.12.2
व्रतानि यज्ञश्छन्दांसि तीर्थानि नियमा यमाः।
यथावरुन्धे सत्संगः सर्वसंगापहो हि माम्॥ २
vratāni yajñaśchandāṃsi tīrthāni niyamā yamāḥ|
yathāvarundhe satsaṃgaḥ sarvasaṃgāpaho hi mām|| 2
अर्थ
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—प्रिय उद्धव! जगत्में जितनी आसक्तियाँ हैं, उन्हें सत्संग नष्ट कर देता है। यही कारण है कि सत्संग जिस प्रकार मुझे वशमें कर लेता है वैसा साधन न योग है न सांख्य, न धर्मपालन और न स्वाध्याय। तपस्या, त्याग, इष्टापूर्त्त और दक्षिणासे भी मैं वैसा प्रसन्न नहीं होता। कहाँतक कहूँ—व्रत, यज्ञ, वेद, तीर्थ और यम-नियम भी सत्संगके समान मुझे वशमें करनेमें समर्थ नहीं हैं॥ १-२॥