श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.12.3

एकादश स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

सत्संगेन हि दैतेया यातुधाना मृगाः खगाः।

गन्धर्वाप्सरसो नागाः सिद्धाश्‍चारणगुह्यकाः॥ ३

satsaṃgena hi daiteyā yātudhānā mṛgāḥ khagāḥ|

gandharvāpsaraso nāgāḥ siddhāścāraṇaguhyakāḥ|| 3

अर्थ

निष्पाप उद्धवजी! यह एक युगकी नहीं, सभी युगोंकी एक-सी बात है। सत्संगके द्वारा ही दैत्य-राक्षस, पशु-पक्षी, गन्धर्व-अप्सरा, नाग-सिद्ध, चारण-गुह्यक और विद्याधरोंको मेरी प्राप्ति हुई है। मनुष्योंमें वैश्य, शूद्र, स्त्री और अन्त्यज आदि रजोगुणी-तमोगुणी प्रकृतिके बहुत-से जीवोंने मेरा परमपद प्राप्त किया है। वृत्रासुर, प्रह्लाद, वृषपर्वा, बलि, बाणासुर, मयदानव, विभीषण, सुग्रीव, हनुमान्, जाम्बवान्, गजेन्द्र, जटायु, तुलाधार वैश्य, धर्मव्याध, कुब्जा, व्रजकी गोपियाँ, यज्ञपत्‍नियाँ और दूसरे लोग भी सत्संगके प्रभावसे ही मुझे प्राप्त कर सके हैं॥ ३—६॥

यह अर्थ श्लोक 3–6 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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