श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.12.11

एकादश स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

तास्ताः क्षपाः प्रेष्ठतमेन नीता

मयैव वृन्दावनगोचरेण।

क्षणार्धवत्ताः पुनरंग तासां

हीना मया कल्पसमा बभूवुः॥ ११

tāstāḥ kṣapāḥ preṣṭhatamena nītā

mayaiva vṛndāvanagocareṇa|

kṣaṇārdhavattāḥ punaraṃga tāsāṃ

hīnā mayā kalpasamā babhūvuḥ|| 11

अर्थ

तुम जानते हो कि मैं ही उनका एकमात्र प्रियतम हूँ। जब मैं वृन्दावनमें था, तब उन्होंने बहुत-सी रात्रियाँ—वे रासकी रात्रियाँ मेरे साथ आधे क्षणके समान बिता दी थीं; परन्तु प्यारे उद्धव! मेरे बिना वे ही रात्रियाँ उनके लिये एक-एक कल्पके समान हो गयीं॥ ११॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें