श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.12.10

एकादश स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

रामेण सार्धं मथुरां प्रणीते

श्‍वाफल्किना मय्यनुरक्तचित्ताः।

विगाढभावेन न मे वियोग-

तीव्राधयोऽन्यं ददृशुः सुखाय॥ १०

rāmeṇa sārdhaṃ mathurāṃ praṇīte

śvāphalkinā mayyanuraktacittāḥ|

vigāḍhabhāvena na me viyoga-

tīvrādhayo'nyaṃ dadṛśuḥ sukhāya|| 10

अर्थ

उद्धव! जिस समय अक्रूरजी भैया बलरामजीके साथ मुझे व्रजसे मथुरा ले आये, उस समय गोपियोंका हृदय गाढ़ प्रेमके कारण मेरे अनुरागके रंगमें रँगा हुआ था। मेरे वियोगकी तीव्र व्याधिसे वे व्याकुल हो रही थीं और मेरे अतिरिक्त कोई भी दूसरी वस्तु उन्हें सुखकारक नहीं जान पड़ती थी॥ १०॥

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