॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.13.25
गुणेष्वाविशते चेतो गुणाश्चेतसि च प्रजाः।
जीवस्य देह उभयं गुणाश्चेतो मदात्मनः॥ २५
guṇeṣvāviśate ceto guṇāścetasi ca prajāḥ|
jīvasya deha ubhayaṃ guṇāśceto madātmanaḥ|| 25
अर्थ
पुत्रो! यह चित्त चिन्तन करते-करते विषयाकार हो जाता है और विषय चित्तमें प्रविष्ट हो जाते हैं, यह बात सत्य है, तथापि विषय और चित्त ये दोनों ही मेरे स्वरूपभूत जीवके देह हैं—उपाधि हैं। अर्थात् आत्माका चित्त और विषयके साथ कोई सम्बन्ध ही नहीं है॥ २५॥