श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.14.18

एकादश स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

बाध्यमानोऽपि मद्भक्तो विषयैरजितेन्द्रियः।

प्रायः प्रगल्भया भक्त्या विषयैर्नाभिभूयते॥ १८

bādhyamāno'pi madbhakto viṣayairajitendriyaḥ|

prāyaḥ pragalbhayā bhaktyā viṣayairnābhibhūyate|| 18

अर्थ

उद्धवजी! मेरा जो भक्त अभी जितेन्द्रिय नहीं हो सका है और संसारके विषय बार-बार उसे बाधा पहुँचाते रहते हैं—अपनी ओर खींच लिया करते हैं, वह भी क्षण-क्षणमें बढ़नेवाली मेरी प्रगल्भ भक्तिके प्रभावसे प्रायः विषयोंसे पराजित नहीं होता॥ १८॥✎ 1744 1745

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1744 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: खिल-खिलाकर → खिलखिलाकर
  • #1745 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: पिघल-कर → पिघलकर

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