श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.15.12

एकादश स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

परमाणुमये चित्तं भूतानां मयि रंजयन्।

कालसूक्ष्मार्थतां योगी लघिमानमवाप्नुयात्॥ १२

paramāṇumaye cittaṃ bhūtānāṃ mayi raṃjayan|

kālasūkṣmārthatāṃ yogī laghimānamavāpnuyāt|| 12

अर्थ

जो योगी वायु आदि चार भूतोंके परमाणुओंको मेरा ही रूप समझकर चित्तको तदाकार कर देता है, उसे ‘लघिमा’ सिद्धि प्राप्त हो जाती है—उसे परमाणुरूप कालके* समान सूक्ष्म वस्तु बननेका सामर्थ्य प्राप्त हो जाता है॥ १२॥

टिप्पणियाँ

  1. *

    पृथ्वी आदिके परमाणुओंमें गुरुत्व विद्यमान रहता है। इसीसे उसका भी निषेध करनेके लिये कालके परमाणुकी समानता बतायी है।

    (मुद्रित पृष्ठ 806)

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