श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

एकादश स्कन्ध · अध्याय 15

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मुद्रित ग्रन्थमें: द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 804–809

श्लोक-सूची
पृष्ठ 804

जितेन्द्रियस्य युक्तस्य जितश्‍वासस्य योगिनः।

मयि धारयतश्‍चेत उपतिष्ठन्ति सिद्धयः॥ १11.15.1

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं—प्रिय उद्धव! जब साधक इन्द्रिय, प्राण और मनको अपने वशमें करके अपना चित्त मुझमें लगाने लगता है, मेरी धारणा करने लगता है, तब उसके सामने बहुत-सी सिद्धियाँ उपस्थित होती हैं॥ १॥

उद्धव उवाच

कया धारणया कास्वित् कथंस्वित् सिद्धिरच्युत।

कति वा सिद्धयो ब्रूहि योगिनां सिद्धिदो भवान्॥ २11.15.2

उद्धवजीने कहा—अच्युत! कौन-सी धारणा करनेसे किस प्रकार कौन-सी सिद्धि प्राप्त होती है और उनकी संख्या कितनी है, आप ही योगियोंको सिद्धियाँ देते हैं, अतः आप इनका वर्णन कीजिये॥ २॥

श्रीभगवानुवाच

सिद्धयोऽष्टादश प्रोक्ता धारणायोगपारगैः।

तासामष्टौ मत्प्रधाना दशैव गुणहेतवः॥ ३11.15.3

पृष्ठ 805

अणिमा महिमा मूर्तेर्लघिमा प्राप्तिरिन्द्रियैः।

प्राकाम्यं श्रुतदृष्टेषु शक्तिप्रेरणमीशिता॥ ४11.15.4

गुणेष्वसंगो वशिता यत्कामस्तदवस्यति।

एता मे सिद्धयः सौम्य अष्टावौत्पत्तिका मताः॥ ५11.15.5

अनूर्मिमत्त्वं देहेऽस्मिन् दूरश्रवणदर्शनम्।

मनोजवः कामरूपं परकायप्रवेशनम्॥ ६11.15.6

स्वच्छन्दमृत्युर्देवानां सहक्रीडानुदर्शनम्।

यथासंकल्पसंसिद्धिराज्ञाप्रतिहतागतिः ॥ ७11.15.7

त्रिकालज्ञत्वमद्वन्द्वं परचित्ताद्यभिज्ञता।

अ‌ग्‍न्यर्काम्बुविषादीनां प्रतिष्टम्भोऽपराजयः॥ ८11.15.8

एताश्‍चोद्देशतः प्रोक्ता योगधारणसिद्धयः।

यया धारणया या स्याद् यथा वा स्यान्‍निबोध मे॥ ९11.15.9

भगवान् श्रीकृष्णने कहा—प्रिय उद्धव! धारणायोगके पारगामी योगियोंने अठारह प्रकारकी सिद्धियाँ बतलायी हैं। उनमें आठ सिद्धियाँ तो प्रधानरूपसे मुझमें ही रहती हैं और दूसरोंमें न्यून; तथा दस सत्त्वगुणके विकाससे भी मिल जाती हैं॥ ३॥ उनमें तीन सिद्धियाँ तो शरीरकी हैं—‘अणिमा’,‘महिमा’ और ‘लघिमा’। इन्द्रियोंकी एक सिद्धि है—‘प्राप्ति’। लौकिक और पारलौकिक पदार्थोंका इच्छानुसार अनुभव करनेवाली सिद्धि ‘प्राकाम्य’ है। माया और उसके कार्योंको इच्छानुसार संचालित करना ‘ईशिता’ नामकी सिद्धि है॥ ४॥ विषयोंमें रहकर भी उनमें आसक्त न होना ‘वशिता’ है और जिस-जिस सुखकी कामना करे, उसकी सीमातक पहुँच जाना ‘कामावसायिता’ नामकी आठवीं सिद्धि है। ये आठों सिद्धियाँ मुझमें स्वभावसे ही रहती हैं और जिन्हें मैं देता हूँ, उन्हींको अंशतः प्राप्त होती हैं॥ ५॥ इनके अतिरिक्त और भी कई सिद्धियाँ हैं। शरीरमें भूख-प्यास आदि वेगोंका न होना, बहुत दूरकी वस्तु देख लेना और बहुत दूरकी बात सुन लेना, मनके साथ ही शरीरका उस स्थानपर पहुँच जाना, जो इच्छा हो वही रूप बना लेना; दूसरे शरीरमें प्रवेश करना, जब इच्छा हो तभी शरीर छोड़ना, अप्सराओंके साथ होनेवाली देवक्रीड़ाका दर्शन, संकल्पकी सिद्धि, सब जगह सबके द्वारा बिना ननु-नचके आज्ञापालन—ये दस सिद्धियाँ सत्त्वगुणके विशेष विकाससे होती हैं॥ ६-७॥ भूत, भविष्य और वर्तमानकी बात जान लेना; शीत-उष्ण, सुख-दुःख और राग-द्वेष आदि द्वन्द्वोंके वशमें न होना, दूसरेके मन आदिकी बात जान लेना; अग्‍नि, सूर्य, जल, विष आदिकी शक्तिको स्तम्भित कर देना और किसीसे भी पराजित न होना—ये पाँच सिद्धियाँ भी योगियोंको प्राप्त होती हैं॥ ८॥ प्रिय उद्धव! योग-धारणा करनेसे जो सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, उनका मैंने नाम-निर्देशके साथ वर्णन कर दिया। अब किस धारणासे कौन-सी सिद्धि कैसे प्राप्त होती है, यह बतलाता हूँ, सुनो॥ ९॥

भूतसूक्ष्मात्मनि मयि तन्मात्रं धारयेन्मनः।

अणिमानमवाप्नोति तन्मात्रोपासको मम॥ १० 11.15.10

पृष्ठ 806

महत्यात्मन्मयि परे यथासंस्थं मनो दधत्।

महिमानमवाप्नोति भूतानां च पृथक् पृथक्॥ ११11.15.11

परमाणुमये चित्तं भूतानां मयि रंजयन्।

कालसूक्ष्मार्थतां योगी लघिमानमवाप्नुयात्॥ १२11.15.12

पृष्ठ 805

प्रिय उद्धव! पंचभूतोंकी सूक्ष्मतम मात्राएँ मेरा ही शरीर है। जो साधक केवल मेरे उसी शरीरकी उपासना करता है और अपने मनको तदाकार बनाकर उसीमें लगा देता है अर्थात् मेरे तन्मात्रात्मक शरीरके अतिरिक्त और किसी भी वस्तुका चिन्तन नहीं करता, उसे ‘अणिमा’ नामकी सिद्धि अर्थात् पत्थरकी चट्टान आदिमें भी प्रवेश करनेकी शक्ति—अणुता प्राप्त हो जाती है॥ १०॥ महत्तत्त्वके रूपमें भी मैं ही प्रकाशित हो रहा हूँ और उस रूपमें समस्त व्यावहारिक ज्ञानोंका केन्द्र हूँ। जो मेरे उस रूपमें अपने मनको महत्तत्त्वाकार करके तन्मय कर देता है, उसे ‘महिमा’ नामकी सिद्धि प्राप्त होती है, और इसी प्रकार आकाशादि पंचभूतोंमें—जो मेरे ही शरीर हैं—अलग-अलग मन लगानेसे उन-उनकी महत्ता प्राप्त हो जाती है, यह भी ‘महिमा’ सिद्धिके ही अन्तर्गत है॥ ११॥ जो योगी वायु आदि चार भूतोंके परमाणुओंको मेरा ही रूप समझकर चित्तको तदाकार कर देता है, उसे ‘लघिमा’ सिद्धि प्राप्त हो जाती है—उसे परमाणुरूप कालके* समान सूक्ष्म वस्तु बननेका सामर्थ्य प्राप्त हो जाता है॥ १२॥

धारयन् मय्यहंतत्त्वे मनो वैकारिकेऽखिलम्।

सर्वेन्द्रियाणामात्मत्वं प्राप्तिं प्राप्नोति मन्मनाः॥ १३11.15.13

महत्यात्मनि यः सूत्रे धारयेन्मयि मानसम्।

प्राकाम्यं पारमेष्ठ्यं मे विन्दतेऽव्यक्तजन्मनः॥ १४11.15.14

विष्णौ त्र्यधीश्‍वरे चित्तं धारयेत् कालविग्रहे।✎ 2154

स ईशित्वमवाप्नोति क्षेत्रक्षेत्रज्ञचोदनाम्॥ १५11.15.15

नारायणे तुरीयाख्ये भगवच्छब्दशब्दिते।

मनो मय्यादधद् योगी मद्धर्मा वशितामियात्॥ १६11.15.16

निर्गुणे ब्रह्मणि मयि धारयन् विशदं मनः।

परमानन्दमाप्नोति यत्र कामोऽवसीयते॥ १७11.15.17

पृष्ठ 807

श्‍वेतद्वीपपतौ चित्तं शुद्धे धर्ममये मयि।

धारयञ्छ्वेततां याति षडूर्मिरहितो नरः॥ १८11.15.18

मय्याकाशात्मनि प्राणे मनसा घोषमुद्वहन्।

तत्रोपलब्धा भूतानां हंसो वाचः शृणोत्यसौ॥ १९11.15.19

चक्षुस्त्वष्टरि संयोज्य त्वष्टारमपि चक्षुषि।

मां तत्र मनसा ध्यायन् विश्‍वं पश्यति सूक्ष्मदृक्॥ २०11.15.20

मनो मयि सुसंयोज्य देहं तदनु वायुना।

मद्धारणानुभावेन तत्रात्मा यत्र वै मनः॥ २१11.15.21

यदा मन उपादाय यद् यद् रूपं बुभूषति।

तत्तद् भवेन्मनोरूपं मद्योगबलमाश्रयः॥ २२11.15.22

परकायं विशन् सिद्ध आत्मानं तत्र भावयेत्।

पिण्डं हित्वा विशेत् प्राणो वायुभूतः षडङ्‌घ्रिवत्॥ २३11.15.23

पार्ष्ण्याऽऽपीड्य गुदं प्राणं हृदुरःकण्ठमूर्धसु।

आरोप्य ब्रह्मरन्ध्रेण ब्रह्म नीत्वोत्सृजेत्तनुम्॥ २४11.15.24

विहरिष्यन् सुराक्रीडे मत्स्थं सत्त्वं विभावयेत्।

विमानेनोपतिष्ठन्ति सत्त्ववृत्तीः सुरस्त्रियः॥ २५11.15.25

पृष्ठ 806

जो सात्त्विक अहंकारको मेरा स्वरूप समझकर मेरे उसी रूपमें चित्तकी धारणा करता है, वह समस्त इन्द्रियोंका अधिष्ठाता हो जाता है। मेरा चिन्तन करनेवाला भक्त इस प्रकार ‘प्राप्ति’ नामकी सिद्धि प्राप्त कर लेता है॥ १३॥ जो पुरुष मुझ महत्तत्त्वाभिमानी सूत्रात्मामें अपना चित्त स्थिर करता है, उसे मुझ अव्यक्तजन्मा (सूत्रात्मा) की ‘प्राकाम्य’ नामकी सिद्धि प्राप्त होती है—जिससे इच्छानुसार सभी भोग प्राप्त हो जाते हैं॥ १४॥ जो त्रिगुणमयी मायाके स्वामी मेरे काल-स्वरूप विश्‍वरूपकी धारणा करता है, वह शरीरों और जीवोंको अपने इच्छानुसार प्रेरित करनेकी सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है। इस सिद्धिका नाम ‘ईशित्व’ है॥ १५॥ जो योगी मेरे नारायण-स्वरूपमें—जिसे तुरीय और भगवान् भी कहते हैं—मनको लगा देता है, मेरे स्वाभाविक गुण उसमें प्रकट होने लगते हैं और उसे ‘वशिता’ नामकी सिद्धि प्राप्त हो जाती है॥ १६॥ निर्गुण ब्रह्म भी मैं ही हूँ। जो अपना निर्मल मन मेरे इस ब्रह्मस्वरूपमें स्थित कर लेता है, उसे परमानन्द-स्वरूपिणी ‘कामावसायिता’ नामकी सिद्धि प्राप्त होती है। इसके मिलनेपर उसकी सारी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं, समाप्त हो जाती हैं॥ १७॥ प्रिय उद्धव! मेरा वह रूप, जो श्‍वेतद्वीपका स्वामी है, अत्यन्त शुद्ध और धर्ममय है। जो उसकी धारणा करता है, वह भूख-प्यास, जन्म-मृत्यु और शोक-मोह—इन छः ऊर्मियोंसे मुक्त हो जाता है और उसे शुद्ध स्वरूपकी प्राप्ति होती है॥ १८॥ मैं ही समष्टि-प्राणरूप आकाशात्मा हूँ। जो मेरे इस स्वरूपमें मनके द्वारा अनाहत नादका चिन्तन करता है, वह ‘दूरश्रवण’ नामकी सिद्धिसे सम्पन्‍न हो जाता है और आकाशमें उपलब्ध होनेवाली विविध प्राणियोंकी बोली सुन-समझ सकता है॥ १९॥ जो योगी नेत्रोंको सूर्यमें और सूर्यको नेत्रोंमें संयुक्त कर देता है और दोनोंके संयोगमें मन-ही-मन मेरा ध्यान करता है, उसकी दृष्टि सूक्ष्म हो जाती है, उसे ‘दूरदर्शन’ नामकी सिद्धि प्राप्त होती है और वह सारे संसारको देख सकता है॥ २०॥ मन और शरीरको प्राणवायुके सहित मेरे साथ संयुक्त कर दे और मेरी धारणा करे तो इससे ‘मनोजव’ नामकी सिद्धि प्राप्त हो जाती है। इसके प्रभावसे वह योगी जहाँ भी जानेका संकल्प करता है, वहीं उसका शरीर उसी क्षण पहुँच जाता है॥ २१॥ जिस समय योगी मनको उपादान-कारण बनाकर किसी देवता आदिका रूप धारण करना चाहता है तो वह अपने मनके अनुकूल वैसा ही रूप धारण कर लेता है। इसका कारण यह है कि उसने अपने चित्तको मेरे साथ जोड़ दिया है॥ २२॥ जो योगी दूसरे शरीरमें प्रवेश करना चाहे, वह ऐसी भावना करे कि मैं उसी शरीरमें हूँ। ऐसा करनेसे उसका प्राण वायुरूप धारण कर लेता है और वह एक फूलसे दूसरे फूलपर जानेवाले भौंरेके समान अपना शरीर छोड़कर दूसरे शरीरमें प्रवेश कर जाता है॥ २३॥ योगीको यदि शरीरका परित्याग करना हो तो एड़ीसे गुदाद्वारको दबाकर प्राणवायुको क्रमशः हृदय, वक्षःस्थल, कण्ठ और मस्तकमें ले जाय। फिर ब्रह्मरन्ध्रके द्वारा उसे ब्रह्ममें लीन करके शरीरका परित्याग कर दे॥ २४॥ यदि उसे देवताओंके विहारस्थलोंमें क्रीड़ा करनेकी इच्छा हो, तो मेरे शुद्ध सत्त्वमय स्वरूपकी भावना करे। ऐसा करनेसे सत्त्वगुणकी अंशस्वरूपा सुर-सुन्दरियाँ विमानपर चढ़कर उसके पास पहुँच जाती हैं॥ २५॥

पृष्ठ 808

यथा संकल्पयेद् बुद्ध्या यदा वा मत्परः पुमान्।

मयि सत्ये मनो युंजंस्तथा तत् समुपाश्‍नुते॥ २६11.15.26

यो वै मद्भावमापन्‍न ईशितुर्वशितुः पुमान्।

कुतश्‍चिन्‍न विहन्येत तस्य चाज्ञा यथा मम॥ २७11.15.27

मद्भक्त्या शुद्धसत्त्वस्य योगिनो धारणाविदः।

तस्य त्रैकालिकी बुद्धिर्जन्ममृत्यूपबृंहिता॥ २८11.15.28

अ‌ग्‍न्यादिभिर्न हन्येत मुनेर्योगमयं वपुः।

मद्योगश्रान्तचित्तस्य यादसामुदकं यथा॥ २९11.15.29

मद्विभूतीरभिध्यायन् श्रीवत्सास्त्रविभूषिताः।

ध्वजातपत्रव्यजनैः स भवेदपराजितः॥ ३०11.15.30

पृष्ठ 808

जिस पुरुषने मेरे सत्यसंकल्पस्वरूपमें अपना चित्त स्थिर कर दिया है, उसीके ध्यानमें संल‌ग्‍न है, वह अपने मनसे जिस समय जैसा संकल्प करता है, उसी समय उसका वह संकल्प सिद्ध हो जाता है॥ २६॥ मैं ‘ईशित्व’ और ‘वशित्व’—इन दोनों सिद्धियोंका स्वामी हूँ; इसलिये कभी कोई मेरी आज्ञा टाल नहीं सकता। जो मेरे उस रूपका चिन्तन करके उसी भावसे युक्त हो जाता है, मेरे समान उसकी आज्ञाको भी कोई टाल नहीं सकता॥ २७॥ जिस योगीका चित्त मेरी धारणा करते-करते मेरी भक्तिके प्रभावसे शुद्ध हो गया है, उसकी बुद्धि जन्म-मृत्यु आदि अदृष्ट विषयोंको भी जान लेती है। और तो क्या—भूत, भविष्य और वर्तमानकी सभी बातें उसे मालूम हो जाती हैं॥ २८॥ जैसे जलके द्वारा जलमें रहनेवाले प्राणियोंका नाश नहीं होता, वैसे ही जिस योगीने अपना चित्त मुझमें लगाकर शिथिल कर दिया है, उसके योगमय शरीरको अग्‍नि, जल आदि कोई भी पदार्थ नष्ट नहीं कर सकते॥ २९॥ जो पुरुष श्रीवत्स आदि चिह्न और शंख-गदा-चक्र-पद्म आदि आयुधोंसे विभूषित तथा ध्वजा-छत्र-चँवर आदिसे सम्पन्‍न मेरे अवतारोंका ध्यान करता है, वह अजेय हो जाता है॥ ३०॥

उपासकस्य मामेवं योगधारणया मुनेः।

सिद्धयः पूर्वकथिता उपतिष्ठन्त्यशेषतः॥ ३१11.15.31

जितेन्द्रियस्य दान्तस्य जितश्‍वासात्मनो मुनेः।

मद्धारणां धारयतः का सा सिद्धिः सुदुर्लभा॥ ३२11.15.32

अन्तरायान् वदन्त्येता युंजतो योगमुत्तमम्।

मया सम्पद्यमानस्य कालक्षपणहेतवः॥ ३३11.15.33

पृष्ठ 809

जन्मौषधितपोमन्त्रैर्यावतीरिह सिद्धयः।

योगेनाप्नोति ताः सर्वा नान्यैर्योगगतिं व्रजेत्॥ ३४11.15.34

सर्वासामपि सिद्धीनां हेतुः पतिरहं प्रभुः।

अहं योगस्य सांख्यस्य धर्मस्य ब्रह्मवादिनाम्॥ ३५11.15.35

अहमात्माऽऽन्तरो बाह्योऽनावृतः सर्वदेहिनाम्।

यथा भूतानि भूतेषु बहिरन्तः स्वयं तथा॥ ३६11.15.36

इस प्रकार जो विचारशील पुरुष मेरी उपासना करता है और योगधारणाके द्वारा मेरा चिन्तन करता है, उसे वे सभी सिद्धियाँ पूर्णतः प्राप्त हो जाती हैं, जिनका वर्णन मैंने किया है॥ ३१॥ प्यारे उद्धव! जिसने अपने प्राण, मन और इन्द्रियोंपर विजय प्राप्त कर ली है, जो संयमी है और मेरे ही स्वरूपकी धारणा कर रहा है, उसके लिये ऐसी कोई भी सिद्धि नहीं, जो दुर्लभ हो। उसे तो सभी सिद्धियाँ प्राप्त ही हैं॥ ३२॥ परन्तु श्रेष्ठ पुरुष कहते हैं कि जो लोग भक्तियोग अथवा ज्ञानयोगादि उत्तम योगोंका अभ्यास कर रहे हैं, जो मुझसे एक हो रहे हैं उनके लिये इन सिद्धियोंका प्राप्त होना एक विघ्न ही है; क्योंकि इनके कारण व्यर्थ ही उनके समयका दुरुपयोग होता है॥ ३३॥ जगत‍्में जन्म, ओषधि, तपस्या और मन्त्रादिके द्वारा जितनी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, वे सभी योगके द्वारा मिल जाती हैं; परन्तु योगकी अन्तिम सीमा—मेरे सारूप्य, सालोक्य आदिकी प्राप्ति बिना मुझमें चित्त लगाये किसी भी साधनसे नहीं प्राप्त हो सकती॥ ३४॥ ब्रह्मवादियोंने बहुत-से साधन बतलाये हैं—योग, सांख्य और धर्म आदि। उनका एवं समस्त सिद्धियोंका एकमात्र मैं ही हेतु, स्वामी और प्रभु हूँ॥ ३५॥ जैसे स्थूल पंचभूतोंमें बाहर, भीतर—सर्वत्र सूक्ष्म पंच-महाभूत ही हैं, सूक्ष्म भूतोंके अतिरिक्त स्थूल भूतोंकी कोई सत्ता ही नहीं है, वैसे ही मैं समस्त प्राणियोंके भीतर द्रष्टारूपसे और बाहर दृश्यरूपसे स्थित हूँ। मुझमें बाहर-भीतरका भेद भी नहीं है; क्योंकि मैं निरावरण, एक—अद्वितीय आत्मा हूँ॥ ३६॥

पृष्ठ 809

इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे पञ्चदशोऽध्यायः

॥ १५॥

टिप्पणियाँ

  1. *

    पृथ्वी आदिके परमाणुओंमें गुरुत्व विद्यमान रहता है। इसीसे उसका भी निषेध करनेके लिये कालके परमाणुकी समानता बतायी है।

    (मुद्रित पृष्ठ 806)

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