श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.15.21

एकादश स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

मनो मयि सुसंयोज्य देहं तदनु वायुना।

मद्धारणानुभावेन तत्रात्मा यत्र वै मनः॥ २१

mano mayi susaṃyojya dehaṃ tadanu vāyunā|

maddhāraṇānubhāvena tatrātmā yatra vai manaḥ|| 21

अर्थ

मन और शरीरको प्राणवायुके सहित मेरे साथ संयुक्त कर दे और मेरी धारणा करे तो इससे ‘मनोजव’ नामकी सिद्धि प्राप्त हो जाती है। इसके प्रभावसे वह योगी जहाँ भी जानेका संकल्प करता है, वहीं उसका शरीर उसी क्षण पहुँच जाता है॥ २१॥

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