श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.15.34

एकादश स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

जन्मौषधितपोमन्त्रैर्यावतीरिह सिद्धयः।

योगेनाप्नोति ताः सर्वा नान्यैर्योगगतिं व्रजेत्॥ ३४

janmauṣadhitapomantrairyāvatīriha siddhayaḥ|

yogenāpnoti tāḥ sarvā nānyairyogagatiṃ vrajet|| 34

अर्थ

जगत‍्में जन्म, ओषधि, तपस्या और मन्त्रादिके द्वारा जितनी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, वे सभी योगके द्वारा मिल जाती हैं; परन्तु योगकी अन्तिम सीमा—मेरे सारूप्य, सालोक्य आदिकी प्राप्ति बिना मुझमें चित्त लगाये किसी भी साधनसे नहीं प्राप्त हो सकती॥ ३४॥

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