परन्तु श्रेष्ठ पुरुष कहते हैं कि जो लोग भक्तियोग अथवा ज्ञानयोगादि उत्तम योगोंका अभ्यास कर रहे हैं, जो मुझसे एक हो रहे हैं उनके लिये इन सिद्धियोंका प्राप्त होना एक विघ्न ही है; क्योंकि इनके कारण व्यर्थ ही उनके समयका दुरुपयोग होता है॥ ३३॥
अन्तरायान् वदन्त्येता युंजतो योगमुत्तमम्।
मया सम्पद्यमानस्य कालक्षपणहेतवः॥ ३३
परन्तु श्रेष्ठ पुरुष कहते हैं कि जो लोग भक्तियोग अथवा ज्ञानयोगादि उत्तम योगोंका अभ्यास कर रहे हैं, जो मुझसे एक हो रहे हैं उनके लिये इन सिद्धियोंका प्राप्त होना एक विघ्न ही है; क्योंकि इनके कारण व्यर्थ ही उनके समयका दुरुपयोग होता है॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.15.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 808) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/15/33/