श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.15.23

एकादश स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

परकायं विशन् सिद्ध आत्मानं तत्र भावयेत्।

पिण्डं हित्वा विशेत् प्राणो वायुभूतः षडङ्‌घ्रिवत्॥ २३

parakāyaṃ viśan siddha ātmānaṃ tatra bhāvayet|

piṇḍaṃ hitvā viśet prāṇo vāyubhūtaḥ ṣaḍaṅghrivat|| 23

अर्थ

जो योगी दूसरे शरीरमें प्रवेश करना चाहे, वह ऐसी भावना करे कि मैं उसी शरीरमें हूँ। ऐसा करनेसे उसका प्राण वायुरूप धारण कर लेता है और वह एक फूलसे दूसरे फूलपर जानेवाले भौंरेके समान अपना शरीर छोड़कर दूसरे शरीरमें प्रवेश कर जाता है॥ २३॥

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