उनमें तीन सिद्धियाँ तो शरीरकी हैं—‘अणिमा’,‘महिमा’ और ‘लघिमा’। इन्द्रियोंकी एक सिद्धि है—‘प्राप्ति’। लौकिक और पारलौकिक पदार्थोंका इच्छानुसार अनुभव करनेवाली सिद्धि ‘प्राकाम्य’ है। माया और उसके कार्योंको इच्छानुसार संचालित करना ‘ईशिता’ नामकी सिद्धि है॥ ४॥
अणिमा महिमा मूर्तेर्लघिमा प्राप्तिरिन्द्रियैः।
प्राकाम्यं श्रुतदृष्टेषु शक्तिप्रेरणमीशिता॥ ४
उनमें तीन सिद्धियाँ तो शरीरकी हैं—‘अणिमा’,‘महिमा’ और ‘लघिमा’। इन्द्रियोंकी एक सिद्धि है—‘प्राप्ति’। लौकिक और पारलौकिक पदार्थोंका इच्छानुसार अनुभव करनेवाली सिद्धि ‘प्राकाम्य’ है। माया और उसके कार्योंको इच्छानुसार संचालित करना ‘ईशिता’ नामकी सिद्धि है॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.15.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 805) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/15/4/