श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.15.5

एकादश स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

गुणेष्वसंगो वशिता यत्कामस्तदवस्यति।

एता मे सिद्धयः सौम्य अष्टावौत्पत्तिका मताः॥ ५

guṇeṣvasaṃgo vaśitā yatkāmastadavasyati|

etā me siddhayaḥ saumya aṣṭāvautpattikā matāḥ|| 5

अर्थ

विषयोंमें रहकर भी उनमें आसक्त न होना ‘वशिता’ है और जिस-जिस सुखकी कामना करे, उसकी सीमातक पहुँच जाना ‘कामावसायिता’ नामकी आठवीं सिद्धि है। ये आठों सिद्धियाँ मुझमें स्वभावसे ही रहती हैं और जिन्हें मैं देता हूँ, उन्हींको अंशतः प्राप्त होती हैं॥ ५॥

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