श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.15.31

एकादश स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

उपासकस्य मामेवं योगधारणया मुनेः।

सिद्धयः पूर्वकथिता उपतिष्ठन्त्यशेषतः॥ ३१

upāsakasya māmevaṃ yogadhāraṇayā muneḥ|

siddhayaḥ pūrvakathitā upatiṣṭhantyaśeṣataḥ|| 31

अर्थ

इस प्रकार जो विचारशील पुरुष मेरी उपासना करता है और योगधारणाके द्वारा मेरा चिन्तन करता है, उसे वे सभी सिद्धियाँ पूर्णतः प्राप्त हो जाती हैं, जिनका वर्णन मैंने किया है॥ ३१॥

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