॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.15.36
अहमात्माऽऽन्तरो बाह्योऽनावृतः सर्वदेहिनाम्।
यथा भूतानि भूतेषु बहिरन्तः स्वयं तथा॥ ३६
ahamātmā''ntaro bāhyo'nāvṛtaḥ sarvadehinām|
yathā bhūtāni bhūteṣu bahirantaḥ svayaṃ tathā|| 36
अर्थ
जैसे स्थूल पंचभूतोंमें बाहर, भीतर—सर्वत्र सूक्ष्म पंच-महाभूत ही हैं, सूक्ष्म भूतोंके अतिरिक्त स्थूल भूतोंकी कोई सत्ता ही नहीं है, वैसे ही मैं समस्त प्राणियोंके भीतर द्रष्टारूपसे और बाहर दृश्यरूपसे स्थित हूँ। मुझमें बाहर-भीतरका भेद भी नहीं है; क्योंकि मैं निरावरण, एक—अद्वितीय आत्मा हूँ॥ ३६॥
इति श्रीमद्भागवते महापुराणे पारमहंस्यां संहितायामेकादशस्कन्धे पञ्चदशोऽध्यायः
॥ १५॥