॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.15.18
श्वेतद्वीपपतौ चित्तं शुद्धे धर्ममये मयि।
धारयञ्छ्वेततां याति षडूर्मिरहितो नरः॥ १८
śvetadvīpapatau cittaṃ śuddhe dharmamaye mayi|
dhārayañchvetatāṃ yāti ṣaḍūrmirahito naraḥ|| 18
अर्थ
प्रिय उद्धव! मेरा वह रूप, जो श्वेतद्वीपका स्वामी है, अत्यन्त शुद्ध और धर्ममय है। जो उसकी धारणा करता है, वह भूख-प्यास, जन्म-मृत्यु और शोक-मोह—इन छः ऊर्मियोंसे मुक्त हो जाता है और उसे शुद्ध स्वरूपकी प्राप्ति होती है॥ १८॥