प्राकाम्यं पारमेष्ठ्यं मे विन्दतेऽव्यक्तजन्मनः॥ १४
mahatyātmani yaḥ sūtre dhārayenmayi mānasam|
prākāmyaṃ pārameṣṭhyaṃ me vindate'vyaktajanmanaḥ|| 14
अर्थ
जो पुरुष मुझ महत्तत्त्वाभिमानी सूत्रात्मामें अपना चित्त स्थिर करता है, उसे मुझ अव्यक्तजन्मा (सूत्रात्मा) की ‘प्राकाम्य’ नामकी सिद्धि प्राप्त होती है—जिससे इच्छानुसार सभी भोग प्राप्त हो जाते हैं॥ १४॥
महत्यात्मनि यः सूत्रे धारयेन्मयि मानसम्।
प्राकाम्यं पारमेष्ठ्यं मे विन्दतेऽव्यक्तजन्मनः॥ १४
जो पुरुष मुझ महत्तत्त्वाभिमानी सूत्रात्मामें अपना चित्त स्थिर करता है, उसे मुझ अव्यक्तजन्मा (सूत्रात्मा) की ‘प्राकाम्य’ नामकी सिद्धि प्राप्त होती है—जिससे इच्छानुसार सभी भोग प्राप्त हो जाते हैं॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.15.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 806) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/15/14/