श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.15.14

एकादश स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

महत्यात्मनि यः सूत्रे धारयेन्मयि मानसम्।

प्राकाम्यं पारमेष्ठ्यं मे विन्दतेऽव्यक्तजन्मनः॥ १४

mahatyātmani yaḥ sūtre dhārayenmayi mānasam|

prākāmyaṃ pārameṣṭhyaṃ me vindate'vyaktajanmanaḥ|| 14

अर्थ

जो पुरुष मुझ महत्तत्त्वाभिमानी सूत्रात्मामें अपना चित्त स्थिर करता है, उसे मुझ अव्यक्तजन्मा (सूत्रात्मा) की ‘प्राकाम्य’ नामकी सिद्धि प्राप्त होती है—जिससे इच्छानुसार सभी भोग प्राप्त हो जाते हैं॥ १४॥

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