मैं ‘ईशित्व’ और ‘वशित्व’—इन दोनों सिद्धियोंका स्वामी हूँ; इसलिये कभी कोई मेरी आज्ञा टाल नहीं सकता। जो मेरे उस रूपका चिन्तन करके उसी भावसे युक्त हो जाता है, मेरे समान उसकी आज्ञाको भी कोई टाल नहीं सकता॥ २७॥
यो वै मद्भावमापन्न ईशितुर्वशितुः पुमान्।
कुतश्चिन्न विहन्येत तस्य चाज्ञा यथा मम॥ २७
मैं ‘ईशित्व’ और ‘वशित्व’—इन दोनों सिद्धियोंका स्वामी हूँ; इसलिये कभी कोई मेरी आज्ञा टाल नहीं सकता। जो मेरे उस रूपका चिन्तन करके उसी भावसे युक्त हो जाता है, मेरे समान उसकी आज्ञाको भी कोई टाल नहीं सकता॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.15.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 808) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/15/27/