गतिशील पदार्थोंमें मैं गति हूँ। अपने अधीन करनेवालोंमें मैं काल हूँ। गुणोंमें मैं उनकी मूलस्वरूपा साम्यावस्था हूँ और जितने भी गुणवान् पदार्थ हैं, उनमें उनका स्वाभाविक गुण हूँ॥ १०॥✎ 17481749
अहं गतिर्गतिमतां कालः कलयतामहम्।
गुणानां चाप्यहं साम्यं गुणिन्यौत्पत्तिको गुणः॥ १०
गतिशील पदार्थोंमें मैं गति हूँ। अपने अधीन करनेवालोंमें मैं काल हूँ। गुणोंमें मैं उनकी मूलस्वरूपा साम्यावस्था हूँ और जितने भी गुणवान् पदार्थ हैं, उनमें उनका स्वाभाविक गुण हूँ॥ १०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 11.16.10 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 810) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/11/16/10/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)