श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.16.4

एकादश स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

गूढश्‍चरसि भूतात्मा भूतानां भूतभावन।

न त्वां पश्यन्ति भूतानि पश्यन्तं मोहितानि ते॥ ४

gūḍhaścarasi bhūtātmā bhūtānāṃ bhūtabhāvana|

na tvāṃ paśyanti bhūtāni paśyantaṃ mohitāni te|| 4

अर्थ

समस्त प्राणियोंके जीवनदाता प्रभो! आप समस्त प्राणियोंके अन्तरात्मा हैं। आप उनमें अपनेको गुप्त रखकर लीला करते रहते हैं। आप तो सबको देखते हैं, परन्तु जगत‍्के प्राणी आपकी मायासे ऐसे मोहित हो रहे हैं कि वे आपको नहीं देख पाते॥ ४॥✎ 1747

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1747 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आवरण-रहित, → आवरणरहित,

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