श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.16.5

एकादश स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

याः काश्‍च भूमौ दिवि वै रसायां

विभूतयो दिक्षु महाविभूते।

ता मह्यमाख्याह्यनुभावितास्ते

नमामि ते तीर्थपदाङ्‌घ्रिपद्मम्॥ ५

yāḥ kāśca bhūmau divi vai rasāyāṃ

vibhūtayo dikṣu mahāvibhūte|

tā mahyamākhyāhyanubhāvitāste

namāmi te tīrthapadāṅghripadmam|| 5

अर्थ

अचिन्त्य ऐश्‍वर्यसम्पन्‍न प्रभो! पृथ्वी, स्वर्ग, पाताल तथा दिशा-विदिशाओंमें आपके प्रभावसे युक्त जो-जो भी विभूतियाँ हैं, आप कृपा करके मुझसे उनका वर्णन कीजिये। प्रभो! मैं आपके उन चरणकमलोंकी वन्दना करता हूँ, जो समस्त तीर्थोंको भी तीर्थ बनानेवाले हैं॥ ५॥✎ 1747

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1747 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आवरण-रहित, → आवरणरहित,

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