श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.17.21

एकादश स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

अहिंसा सत्यमस्तेयमकामक्रोधलोभता।

भूतप्रियहितेहा च धर्मोऽयं सार्ववर्णिकः॥ २१

ahiṃsā satyamasteyamakāmakrodhalobhatā|

bhūtapriyahitehā ca dharmo'yaṃ sārvavarṇikaḥ|| 21

अर्थ

उद्धवजी! चारों वर्णों और चारों आश्रमोंके लिये साधारण धर्म यह है कि मन, वाणी और शरीरसे किसीकी हिंसा न करें; सत्यपर दृढ़ रहें; चोरी न करें; काम, क्रोध तथा लोभसे बचें और जिन कामोंके करनेसे समस्त प्राणियोंकी प्रसन्‍नता और उनका भला हो, वही करें॥ २१॥

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