॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.17.33
स्त्रीणां निरीक्षणस्पर्शसंलापक्ष्वेलनादिकम्।
प्राणिनो मिथुनीभूतानगृहस्थोऽग्रतस्त्यजेत्॥ ३३
strīṇāṃ nirīkṣaṇasparśasaṃlāpakṣvelanādikam|
prāṇino mithunībhūtānagṛhastho'gratastyajet|| 33
अर्थ
ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ और संन्यासियोंको चाहिये कि वे स्त्रियोंको देखना, स्पर्श करना, उनसे बातचीत या हँसी-मसखरी आदि करना दूरसे ही त्याग दें; मैथुन करते हुए प्राणियोंपर तो दृष्टिपाततक न करें॥ ३३॥