॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 11.17.34
शौचमाचमनं स्नानं सन्ध्योपासनमार्जवम्२।
तीर्थसेवा जपोऽस्पृश्याभक्ष्यासंभाष्यवर्जनम्॥ ३४
śaucamācamanaṃ snānaṃ sandhyopāsanamārjavam|
tīrthasevā japo'spṛśyābhakṣyāsaṃbhāṣyavarjanam|| 34
अर्थ
प्रिय उद्धव! शौच, आचमन, स्नान, सन्ध्योपासन, सरलता, तीर्थसेवन, जप, समस्त प्राणियोंमें मुझे ही देखना, मन, वाणी और शरीरका संयम—यह ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यासी—सभीके लिये एक-सा नियम है। अस्पृश्योंको न छूना, अभक्ष्य वस्तुओंको न खाना और जिनसे बोलना नहीं चाहिये उनसे न बोलना—ये नियम भी सबके लिये हैं॥ ३४-३५॥
टिप्पणियाँ
- २
सन्ध्योपास्तिर्ममार्चनम्।