श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.17.36

एकादश स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

एवं बृहद् व्रतधरो ब्राह्मणोऽग्‍निरिव ज्वलन्।

मद्भक्तस्तीव्रतपसा दग्धकर्माशयोऽमलः॥ ३६

evaṃ bṛhad vratadharo brāhmaṇo'gniriva jvalan|

madbhaktastīvratapasā dagdhakarmāśayo'malaḥ|| 36

अर्थ

नैष्ठिक ब्रह्मचारी ब्राह्मण इन नियमोंका पालन करनेसे अग्‍निके समान तेजस्वी हो जाता है। तीव्र तपस्याके कारण उसके कर्म-संस्कार भस्म हो जाते हैं, अन्तःकरण शुद्ध हो जाता है और वह मेरा भक्त होकर मुझे प्राप्त कर लेता है॥ ३६॥

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