श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.17.37

एकादश स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

अथानन्तरमावेक्ष्यन् यथा जिज्ञासितागमः।

गुरवे दक्षिणां दत्त्वा स्नायाद् गुर्वनुमोदितः॥ ३७

athānantaramāvekṣyan yathā jijñāsitāgamaḥ|

gurave dakṣiṇāṃ dattvā snāyād gurvanumoditaḥ|| 37

अर्थ

प्यारे उद्धव! यदि नैष्ठिक ब्रह्मचर्य ग्रहण करनेकी इच्छा न हो—गृहस्थाश्रममें प्रवेश करना चाहता हो, तो विधिपूर्वक वेदाध्ययन समाप्त करके आचार्यको दक्षिणा देकर और उनकी अनुमति लेकर समावर्तन-संस्कार करावे—स्नातक बनकर ब्रह्मचर्याश्रम छोड़ दे॥ ३७॥

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