श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.17.55

एकादश स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

कर्मभिर्गृहमेधीयैरिष्ट्वा मामेव भक्तिमान्।

तिष्ठेद् वनं वोपविशेत् प्रजावान् वा परिव्रजेत्॥ ५५ ✎ 1898

karmabhirgṛhamedhīyairiṣṭvā māmeva bhaktimān|

tiṣṭhed vanaṃ vopaviśet prajāvān vā parivrajet|| 55

अर्थ

भक्तिमान् पुरुष गृहस्थोचित शास्त्रोक्त कर्मोंके द्वारा मेरी आराधना करता हुआ घरमें ही रहे, अथवा यदि पुत्रवान् हो तो वानप्रस्थ आश्रममें चला जाय या संन्यासाश्रम स्वीकार कर ले॥ ५५॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1898 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): परिव्रजेद्॥ → परिव्रजेत्॥

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