श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.17.7

एकादश स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

तत्त्वं२ नः सर्वधर्मज्ञ धर्मस्त्वद्भक्तिलक्षणः।

यथा यस्य विधीयेत तथा वर्णय मे प्रभो॥ ७

tattvaṃ naḥ sarvadharmajña dharmastvadbhaktilakṣaṇaḥ|

yathā yasya vidhīyeta tathā varṇaya me prabho|| 7

अर्थ

आप समस्त धर्मोंके मर्मज्ञ हैं; इसलिये प्रभो! आप उस धर्मका वर्णन कीजिये, जो आपकी भक्ति प्राप्त करानेवाला है। और यह भी बतलाइये कि किसके लिये उसका कैसा विधान है॥ ७॥

टिप्पणियाँ

  1. २

    तत्त्वतः सर्व०।

    (मुद्रित पृष्ठ 814)

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