श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 11.18.46

एकादश स्कन्ध · अध्याय 18 · अथाष्टादशोऽध्यायः

इति स्वधर्मनिर्णिक्तसत्त्वो निर्ज्ञातमद्गतिः।

ज्ञानविज्ञानसम्पन्‍नो नचिरात् समुपैति माम्॥ ४६

iti svadharmanirṇiktasattvo nirjñātamadgatiḥ|

jñānavijñānasampanno nacirāt samupaiti mām|| 46

अर्थ

इस प्रकार वह गृहस्थ अपने धर्मपालनके द्वारा अन्तःकरणको शुद्ध करके मेरे ऐश्‍वर्यको—मेरे स्वरूपको जान लेता है और ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्‍न होकर शीघ्र ही मुझे प्राप्त कर लेता है॥ ४६॥

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